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असम में बिहू नृत्य समारोह और महत्व

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बिहू 14 अप्रैल से 20 अप्रैल 2020 तक मनाया जाएगा

बिहू असम में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक काफी लोकप्रिय त्योहार है। बिहू त्योहार खुशी से मनाने और ख़ुशी बाँटने वाले त्योहार के रूप में मनाया जाता है। असम में तीन अलग-अलग प्रकार के बिहू मनाए जाते है,जो असमिया द्वारा बहुत ही खुशी और हर्ष के साथ मनाए जाते हैं। पहले बिहू को रोंगाली बिहू या बोहाग बिहू,दूसरे बिहू को माघ बिहू या भोगाली बिहू और तीसरे बिहू को कोंगाली बिहू या कटी बिहू के नाम से जानते हैं। बिहू का उत्सव सभी असमियों द्वारा खुशीपूर्वक मनाया जाता है, असम में रहने वाले विभिन्न जाति, पंथ, धर्म और विश्वास के सभी लोग इस उत्सव को धूमधाम से मानते है| बिहू असम का राष्ट्रीय त्योहार हैं जिसमें असामी लोक नृत्य और गीत गाकर इसे मनाते हैं। असम के लोग बिहु उत्सव के दौरान ढोल (ढोल), टोका, झुटुली, ताल, गोगोना, पेपा (भैंस के सींग से बना हुआ वाद्य यंत्र) और बाँहि (बांसुरी) के दौरान विभिन्न वाद्य यंत्रों का उपयोग करते हैं। बिहू त्योहार को बिहू के मधुर लोक गीतों और पारंपरिक नृत्यों के बिना अधूरा माना जाता है। इसलिए इस त्यौहार के दौरान, लोग पारंपरिक तरीके से कपड़े पहनते हैं और बिहू का लोक नृत्य भी करते हैं।

बिहू उत्सव का नाम दिमासा कचारिस भाषा से लिया गया है। बिहू दो शब्दों से मिलकर बना है,जिसमे बी का अर्थ होता है पूछना और शू का अर्थ होता है शांति और समृद्धि,लेकिन बाद में भाषाई वरीयताओं के चलते बिशू का नाम बदलकर बिहू हो गया था। दिमासा लोग प्राचीन काल से खेती करने वाला एक समुदाय था, जो ब्राई शिबराई को सर्वोच्च देवता या पिता के रूप में मानते थे,असल में बिहू त्योहार खेती से संबंधित होता है। असम में अधिकतर लोगो का मुख्य व्यवसाय कृषि है या ये भी कह सकते है की असम के लोग खेती पर ही निर्भर है। इसलिए बिहू के त्यौहार के दौरान सभी लोग सीजन की पहली फसल अपने सर्वोच्च देवता को दे देते हैं और अपने जीवन में समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। असम में तीनों बिहू त्योहारों को अलग-अलग समय अवधि के दौरान मनाया जाता है। बिहू मौसम के बदलाव को भी दर्शाता है।

bihu

बिहू उत्सव के प्रकार:

कटि बिहू:

कटि बिहू को अक्टूबर के महीने में मनाया जाता है| जिसे कोंगाली बिहू के नाम से भी जाना जाता है। कटि बिहू के समय धान के खेत पूरी तरह से विकसित हो चुके होते हैं| इसलिए असम के लोग लैंप जलाते हैं और फसल की कटाई के मौसम के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं,इस बिहू में असम के लोग कोई पकवान भी नहीं बनाते है और ना ही आनंद उठाते है जिसकी वजह से इसे कोंगाली बिहू कहते है।

माघ बिहू:

माघ बिहू को जनवरी के महीने में मनाया जाता है और इसे भोगली बिहू के नाम से भी जाना जाता है और इस बिहू में फसल अंत की और होती है| भोगाली शब्द का अर्थ होता है भोग और भोजन। इस समय सभी के घर अन्न भंडार से लगभग भरे हुए होते है। हम भोगाली बिहू के उत्सव दौरान जानवरों जैसे भैंस,मुर्गा इत्यादि की लड़ाई देखने को मिलती है,जिसका लुत्फ़ लगभग सभी मिलजुलकर उठाते है|

रोंगाली बिहू:

रोंगाली बिहू को बोहाग बिहू के नाम से भी जाना जाता है, बोहाग बिहू अप्रैल के महीने में बसंत के मौसम में मनाया जाता है जो असमिया नव वर्ष के शुरू होने को दर्शाता है और साथ ही साथ यह हिंदू सौर कैलेंडर के पहले दिन की शुरुआत का भी संकेत देता है। जैसा कि हम सभी जानते है की अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से नए साल का जश्न मनाया जाता है| उसी तरह असमिया नए साल को रोंगाली बिहू के रूप में मनाते हैं। नए साल के अवसर पर सभी लोग नए नए कपड़े पहनते हैं और असमिया व्यंजनों को तैयार करते हैं जैसे पीठा, लड्डू इत्यादि। युवा लड़कियां और लड़के बिहू नृत्य भी करते हैं और उनमे से किसी एक को सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकार चुना जाता है और उसे बिहू कुवारी की उपाधि भी दी जाती है। इस त्यौहार के दौरान खेतों को धान की खेती के लिए तैयार किया जाता है। प्राचीन समय में रोंगाली बिहू का त्योहार एक महीने तक मनाया जाता था,लेकिन अब केवल सात दिनों तक इस उत्सव को मनाया जाता है। जिसमे पहले दिन मवेशियों की पूजा की जाती है, इसलिए इसे गोरू या गाय बिहू कहा जाता है।

गाय बिहू के दिन लोग अपने घर को साफ करते हैं और किसान अपने मवेशियों को निकटतम नदी या तालाब में ले जाते हैं | लगभग सभी किसान हल्दी पाउडर और कलई दाल को रात में भिगो कर रख देते है,फिर उसे सुबह पीस कर अपनी गाय के शरीर पर मलते हुए उन्हें अच्छी तरह से नहलाते है,फिर उन्हें ताजी सब्जियाँ इत्यादि चीजे खिलाई जाती है,ऐसा करने के पीछे का कारन है की सभी लोगो को लगता है ऐसा करने से मवेशी साल भर तंदुरस्त रहते है| उस दिन उनकी रस्सी भी बदल दी जाती है और उन्हें पूरे दिन के लिए स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति दी जाती है| अलग अलग प्रकार के औषधि वाले पेड़-पौधे जला जाते है जिससे मच्छर-मक्खी भाग जाएं। पारंपरिक रूप से प्रार्थना और माला के साथ पूजा की जाती है। फिर अगले दिन मनु या मानव बिहू का पालन होता है। इस दिन सभी लोग खुद को साफ करते हैं और नए कपड़े पहनते हैं और पूरे समुदाय की भलाई के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।

घर की महिलाएं इस दिन चपटे चावल, गुड़ और दही से विशेष व्यंजन बनाती हैं। बिहू के अवसर पर महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले पारंपरिक कपड़े मेखला को पहनती हैं, जबकि पुरुष धोती और गमछा पहनते हैं। तीसरे दिन को गोसाई या भगवान बिहू के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देवताओं की प्रतिमाओं की पूजा नए साल के लिए की जाती है। जैसा कि रोंगाली बिहू वसंत के मौसम में मनाया जाता है, हम हर जगह अद्भुत मौसम और रंग-बिरंगी नई पोशाकों के साथ नाचते-गाते लोगों के साथ देख सकते हैं। हम रंगों से भरे हर जगह खुशी पा सकते हैं। इस प्रकार इस त्यौहार को रोंग से इसका नाम रोंगली मिला है जिसका अर्थ है रंग। दोस्त और रिश्तेदार एक-दूसरे को उपहार देने जाते हैं।

असमिया नव वर्ष के अवसर पर, अधिकांश शैक्षणिक संस्थान और कार्यालय तीन दिनों की अवधि के लिए बंद रहते हैं। पूरे राज्य में मेलों का आयोजन किया जाता है।


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