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स्वामी श्री रामकृष्ण परमहंस जन्मदिन और जयंती तथ्य

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रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को हुआ था।

हर साल 25 फरवरी को रामकृष्ण परमहंस जयंती मनाई जाती है

भारत के प्रसिद्ध संतो में से एक रामकृष्ण परमहंस है, रामकृष्ण परमहंस एक महान संत, रहस्यवादी और आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने लोगों को एहसास कराया कि इस दुनिया में केवल ईश्वर ही वास्तविक है और बाकी सब कुछ भ्रम है।

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रामकृष्ण परमहंस ने अपना जीवन भगवान की भक्ति, आत्म-साक्षात्कार और हिंदू धर्म के आदर्शों के पालन में ही बिताया था| रामकृष्ण परमहंस का मूल नाम गदाधर था। गदाधर को रामकृष्ण परमहंस नाम की उपाधि दक्षिणेश्वर काली मंदिर की रानी रासमणि के दामाद के दामाद मथुरा मोहन विश्वास ने दी थी। मथुरा मोहन विश्वास के द्वारा नाम दिए जाने के बाद रामकृष्ण के गुरु तोतापुरी ने उन्हें परमहंस कहना शुरू कर दिया, बस तभी से उन्हें रामकृष्ण परमहंस परमहंस कहा जाने लगा।

रामकृष्ण परमहंस का बचपन:

रामकृष्ण परमहंस का जन्म पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले के कामारपुकुर गाँव में रहने वाले एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, उनके पिता का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय और माता का नाम चंद्रमणि था। खुदीराम और उनकी पत्नी दोनों ही सरल,  ईमानदार और भगवान राम को मानने वाले थे, 18 फरवरी 1836 को उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई| जिसका नाम गदाधर रखा गया। गदाधर की माँ चंद्रमणि को उसके जन्म से पहले कई दिव्य सपने दिखाई दिए थे  और गदाधर के पिता खुदीराम को भी आध्यात्मिकता का ज्ञान प्राप्त था।

गदाधर को बचपन से ही पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उन्हें महान संतों की धार्मिक कहानियों, महाकाव्यों और आत्मकथाओं में बहुत रुचि थी| वो बचपन में अक्सर ध्यान की स्थिति में बैठ जाया करते थे, वर्ष 1843 में उनके पिता की मृत्यु से उनके जीवन में भारी बदलाव आ गया था। गदाधर को साधुओं और पवित्र व्यक्तियों की संगति में आनंद मिलता था, जिन्होंने उन्हें अधिक से अधिक ध्यान लगाने का अभ्यास कराया था।

रामकृष्ण परमहंस जीवन  यात्रा:

पिता की मृत्यु के बाद रामकृष्ण के बड़े भाई राम कुमार ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी का पद संभाल लिया था, उनके बाद केवल 17 साल की उम्र में गदाधर भी अपने बड़े भाई राम कुमार के साथ शामिल हो गए, जिन्होंने परिवार के पुजारी के रूप में काम करना शुरू कर दिया था| गदाधर को एक पुजारी के रूप में जिम्मेदारी दी गई थी, जिसे उन्होंने पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से निभाया| उन्होंने बहुत जल्द सभी को प्रभावित कर दिया था, इसीलिए कुछ समय बाद उन्हें दक्षिणेश्वर काली मंदिर में स्थायी पुजारी के रूप में नियुक्त कर दिया गया। यहाँ उन्होंने भगवान के हजार नामों का पाठ करते हुए तप और ध्यान का अभ्यास किया, गदाधर का माँ काली पर अटूट विश्वास था  और वो उनके ध्यान में धीरे-धीरे बहुत ज्यादा लीन होने लगे थे।

रामकृष्ण शादी करने के पक्ष में नहीं थे लेकिन अपनी बूढ़ी मां को खुश करने और उन्हें आराम देने के लिए 23 साल की उम्र में उन्होंने शारदा मणि देवी से शादी कर ली थी। उनकी पत्नी शारदा मणि देवी ने उनकी तपस्या, साधना और ध्यान में उनका साथ दिया और हमेशा उन्हें ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रेरित किया। रामकृष्ण सभी स्त्रियों को अपनी माँ के रूप में देखते थे, वो अपनी पत्नी को भी दिव्य माँ के रूप में देखते और मानते थे और देवी काली के साथ अपनी पत्नी की भी षोडशी पूजा करने लगे थे।

रामकृष्ण परमहंस को भगवान की प्राप्ति:

एक बार एक भिक्षु तोतापुरी घूमते हुए दक्षिणेश्वर मंदिर पहुंच गए, रामकृष्ण परमहंस जब उनके संपर्क में आएं तो उन्होंने तोतापरी को अपना गुरु बना लिया| रामकृष्ण परमहंस तोतापरी से बहुत ज्यादा प्रेरित हुए थे और रामकृष्ण ने अपने गुरु से अद्वैत वेदांत भी सीखा। उसके बाद रामकृष्ण परमहंस ने अपने गुरु तोतापुरी के मार्गदर्शन में छः महीने तक विक्षिप्त अवस्था में रहे। उसके बाद रामकृष्ण परमहंस का नाम प्रसिद्ध होने लगा था और धीरे धीरे उनके जीवन में शिष्यों का आना शुरू हो गया था।

रामकृष्ण परमहंस ने विभिन्न धार्मिक प्रथाओं, साधनाओं और प्रार्थनाओं के माध्यम से भगवान को जाना और महसूस किया था। उन्होंने ईसा मसीह के जीवन के बारे में सुना और उनकी शिक्षाओं का व्यावहारिक रूप से पालन करने के साथ साथ वो इस्लाम धर्म भी मानते थे| वो बुद्ध को भी भगवान का अवतार मानते थे। रामकृष्ण ने सभी प्रथाओं से उन्होंने महसूस किया कि धर्म सबके अलग अलग हो सकते है लेकिन ईश्वर एक ही है। वो देवी काली के बहुत बड़े भक्त थे, लेकिन वो अन्य देवताओं की पूजा और उनके प्रति सम्मान भी रखते थे।

रामकृष्ण परमहंस का मानना था कि इस दुनिया में रहने वाला प्रत्येक पुरुष और महिला पवित्र है। उन्होंने हमेशा कहा कि हम कर्म के माध्यम से भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। रामकृष्ण का मानना था की भगवान हर व्यक्ति में बसते हैं,  इसलिए हम सभी को एक दूसरे मानव के प्रति दयालु होने चाहिए, अगर हम ऐसा करते है तो भगवान भी हमारे प्रति दयालु रहेंगे।

रामकृष्ण परमहंस अपने भाषण के माध्यम से सभी को समझाते थे कि भगवान एक ही हैं। वह हमेशा आगंतुकों से पूछते थे कि क्या उनमे से किसी ने भी कर्मो के आधार पर भगवान की कल्पना की है| भारत में सभी धर्मो के लोग रहते है, हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई जिनके भगवान् अलग अलग है लेकिन सभी एक दूसरे के साथ ख़ुशी और प्यार से रहते है| रामकृष्ण परमहंस ने भगवान को एक ऐसी माँ के रूप में वर्णित करते थे जो अपने बच्चो के स्वाद और पचाने की क्षमता के अनुसार खाना बनाती है। एक माँ अपने बच्चों के लिए खुद को बलिदान देती है और उन्हें संतुष्ट करने और उनमें खुशी लाने के लिए वो कुछ भी करती है। इसलिए उन्होंने बताया की हम सभी को एक माँ के रूप में भगवान की जरुरत होती है।

रामकृष्ण परमहंस शिष्य:

रामकृष्ण परमहंस के अनेको शिष्य थे, उनके शिष्यो में से विवेकानंद एक थे, विवेकानंद का शुरुआत नाम नरेंद्रनाथ था। एक बार विवेकानंद दक्षिणेश्वर के मंदिर घूमने गए, वहाँ पहुंचकर उनकी मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई, वो रामकृष्ण की बातो से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने रामकृष्ण को अपना गुरु मानकर उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को वास्तविक आध्यात्मिक महानता और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताया। शुरुआत में विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस से छवि-पूजा, अनुष्ठान और साधना के खिलाफ बाते करते थे, वो हमेशा ईश्वर के अस्तित्व के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण की मांग रखते थे, लेकिन कुछ समय बाद धीरे-धीरे विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस की महानता का एहसास हुआ और फिर रामकृष्ण परमहंस के साथ उनके जुड़ाव ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। रामकृष्ण परमहंस परमहंस की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद एक महान आध्यात्मिक शिक्षक, मार्गदर्शक और गुरु बने।

विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए 1 मई 1897 को रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना की थी और यह एक गैर-लाभकारी संगठन है जिसका मुख्यालय बेलूर में स्थित है। रामकृष्ण परमहंस मिशन का मुख्य लक्ष्य लोगों को मोक्ष प्राप्त करने में मदद करना है। विवेकानंद ने हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया और वो हमेशा शिक्षा पर जोर देते थे, गरीबों को खाना खिलाने और पुस्तकालयों और अन्य संस्थानों को विकसित करने के लिए वो हमेशा प्रयास करते रहते थे| केवल ईसाई मिशनरियाँ समाज को लाभान्वित कर सकती हैं बल्कि हिन्दू धर्म भी इस मिशन के माध्यम से समाज की सामाजिक बुराइयों का मुकाबला कर सकती हैं।

रामकृष्ण परमहंस ने कभी भी कोई पुस्तक नहीं लिखी और न ही कभी कोई सार्वजनिक व्याख्यान दिया था। वह हमेशा प्रकृति और दैनिक उपयोग की सामान्य चीजों का अवलोकन करके एक सरल भाषा का इस्तेमाल करते थे और उनकी बातचीत को उनके शिष्यों हमेशा नोट किया करते थे। रामकृष्ण के एक शिष्य महेंद्रनाथ गुप्ता थे, जिन्होंने रामकृष्ण की वार्तालापों को बंगाली भाषा में लिखकर एक पुस्तक श्री रामकृष्ण परमहंस कथामृत के रूप में प्रकाशित किया था लेकिन वर्ष 1942 के बाद इसका अंग्रेजी संस्करण द गॉस्पेल ऑफ श्री रामकृष्ण परमहंस जारी किया गया था।

एक बार ईश्वर चंद्र विद्यासागर और बंकिम चंद्र चटर्जी ने रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की और वो उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। रामकृष्ण परमहंस के बहुत सारे भक्त थे, जिनमे से गिरीश घोष, ज़मीदार राखल, चंद्र घोष आदि कुछ अनुयायी भी थे।अपने अंतिम दिनों के दौरान, रामकृष्ण परमहंस को गले में खराश की समस्या का सामना करना पड़ा, धीरे-धीरे उनके गले में कैंसर में विकसित हो गया था। रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु 16 अगस्त 1886 को हो गई और उन्होंने महासमाधि में प्रवेश कर लिया। उसके बाद रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा मणि देवी ने रामकृष्ण के संदेश को आगे बढ़ाने का काम शुरू कर दिया और एक संत बन कर जीवन व्यतीत करने लगी थी।


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